चिंताजनक : दिल्ली में हर दिन दो मासूमों से दुष्कर्म, अपनों के बीच भी सुरक्षित नहीं

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केंद्र सरकार ने बेशक 12 वर्ष से कम उम्र की बच्चियों से दुष्कर्म की वारदात रोकने के लिए कड़ा कानून बना दिया हो, फिर भी राजधानी में उनके साथ दुष्कर्म की वारदातें कम नहीं हो रही हैं। दिल्ली में हर दिन दो मासूमों से दरिंदगी हो रही है। वर्ष 2019 के शुरुआती 166 दिनों में दिल्ली में दुष्कर्म के 976 मामले आए हैं। दिल्ली में हर चार घंटे में दुष्कर्म की एक वारदात हो रही है।

अधिकतर पीड़िता 10 से 15 वर्ष तक की
वर्ष 2019 में 1 जनवरी से 30 अप्रैल के बीच 282 बच्चियों के साथ दुष्कर्म की वारदात हुई, जबकि पिछले वर्ष यह आंकड़ा 278 था। पुलिस के पास पॉक्सो के तहत आने वाले मामलों में सबसे ज्यादा संख्या 10 से 15 साल की पीड़िताओं की होती है। वहीं, 5 साल से कम उम्र की बच्चियों के साथ दुष्कर्म के मामले भी बढ़ रहे हैं और ज्यादातर मामलों में उनके घर के बाहर से उठाकर आरोपियों ने वारदात को अंजाम दिया।

कड़े कानून के बाद भी बेबस
बच्चियों के साथ दुष्कर्म की वारदात रोकने के लिए कड़े कानून बनाने के बाद भी उन्हें समय से न्याय नहीं मिल पा रहा है। इस कारण आरोपियों में कानून का भय नहीं हैं और पीड़िता व उनका परिवार बेबस हैं। समय से न्याय की मांग बढ़ रही है।

अपनों के बीच भी सुरक्षित नहीं
बच्चियों के दुष्कर्म के ज्यादातर मामलों में आरोपी उनके पहचान वाले ही होते हैं, जो बच्चियों को घुमाने, टॉफी, फ्रूटी दिलाने या फिर किसी अन्य बहाने से ले जाकर वारदात करते हैं। वर्ष 2018 में 30 मामलों में बच्चियों के साथ दुष्कर्म की वारदात स्कूल के अंदर हुई, जबकि 32 मामलों में उनके घर के अंदर ही उन्हें शिकार बनाया गया था। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि मासूम बच्चियां अपनों के बीच भी सुरक्षित नहीं हैं। वर्ष 2019 में दर्ज किए गए मामलों में भी ज्यादातर मामलों में बच्चियों के रिश्तेदार ही आरोपी पाए गए।

न्याय की प्रक्रिया धीमी
* दिल्ली की छह जिला अदालतों में 13 पॉक्सो कोर्ट हैं और चार विटनेस रूम हैं।
* इनमें 5217 से ज्यादा केस लंबित हैं, जबकि हर साल 1500 नए केस सामने आते हैं।
* ऐसे कुल दर्ज मामलों में से केवल 12 प्रतिशत में ही आरोपियों को सजा हो पाती है।
* 67.5 प्रतिशत मामलों में किसी न किसी दबाव में पीड़िता बयान से मुकर जाती है, केवल 26.7 प्रतिशत मामलों में ही पीड़िता आरोपी की पहचान करती हैं। * सरकारी वकीलों की कमी और एफएसएल की रिपोर्ट समय पर नहीं मिलने से न्याय मिलने में देरी होती है।

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