EXCLUSIVE: अगले साल 5जी लाएगा इंटरनेट की स्‍पीड में क्रांति, राजन मैथ्यू से खास बातचीत

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भारत में 5जी जल्द ही आने वाला है, लेकिन अभी भी यूजर्स कॉल ड्रॉप, स्लो इंटरनेट स्पीड जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं। पढ़िए सीओएआई के महानिदेशन राजन एस मैथ्यू का इंटरव्यू।

दुनियाभर में 5जी तकनीक को लेकर चर्चा हो रही है। इस तकनीक को धरातल पर लाने के लिए लगातार टेस्टिंग चल रही है। इस बीच, भारत में जहां अभी भी 4जी तकनीक हर क्षेत्र तक नहीं पहुंच पायी है फिर भी 5जी की बाते शुरू हो गयी हैं। ऐसे में भारत में 5जी कब तक लॉन्च होगा और लोगों को इसके लिए कितने पैसे खर्च करने होंगे। इस बारे में उपभोगक्ताओं तक पुख्ता जानकारी पहुंचाने के लिए  ने 5जी, डेटा सिक्योरिटी और बीएसएनल संकट से जुड़े कई मुद्दों पर सेल्यूलर ऑपरेटर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (COAI)के महानिदेशक राजन एस मैथ्यू खास बातचीत की। पेश हैं बातचीत के महत्वपूर्ण अंश-

भारत में 5जी तकनीक को लेकर किस तरह की तैयारियां चल रही हैं?
सरकार ने हाल में एक हाईलेवल कमेटी का गठन किया है। जो इन बातों पर ध्यान दे रही है कि भारत में 5जी को कैसे लागू किया जा सकता है। वह 5जी की लॉन्चिंग के लिए सभी महत्वपूर्ण विकल्पों पर काम कर रही है। ये कमेटी स्पेक्ट्रम, लाइसेंस, नेटवर्क एरिया से जुड़े बिंदुओं पर काम कर रही है। इसके साथ ही कमेटी लाइसेंसिंग के क्षेत्र में भी काम कर रही है, जिससे जब 5जी भारत में लॉन्च हो तो मौजूदा लाइसेंस प्रक्रिया में क्या बदलाव करने होंगे। इसके अलावा रेगुलेशन के क्षेत्र में भी काम किया जा रहा है। मुख्य बात स्पेक्ट्रम की कीमत है, विदेशों में स्पेक्ट्रम की कीमत कम है, लेकिन भारत में ऐसा नहीं है। यहां स्पेक्ट्रम की कीमत काफी ज्यादा है। इस क्षेत्र में भी दूरसंचार विभाग (DoT) काम कर रहा है।

भारत में 5जी तकनीक कब तक देखने को मिलेगी?
हमें उम्मीद हैं कि साल 2020 तक भारत में 5जी की सेवा शुरू हो सकती है।

क्या 5जी सर्विस सभी के लिए होगी?
5जी सेवा कुछ क्षेत्रों के लिए ही उपलब्ध होगी। ये 4जी की तरह पैन इंडिया लेवल पर नहीं होगा। 5जी का इस्तेमाल सिर्फ उन जगहों पर होगा जहां इसकी ज्यादा जरूरत होगी। अगले 10 से 15 साल में बाद जाकर कहीं 5जी पूरी तरह से 4जी को रिप्लेस कर पाएगी।

इसका मतलब है कि 5जी के लिए ग्राहकों को ज्यादा पैसे चुकाने होंगे? 
5जी दो बैंड में उपलब्ध होगी। एक नैरोबैंड और दूसरा ब्रॉडबैंड। चूंकि 5जी में नटवर्क स्लाइसिंग होगी, इसलिए नेटवर्क अपनी सुविधा के मुताबिक कॉन्फ्रिगेशन अपना लेगा। मसलन- अगर किसी को रिमोर्ट सर्जरी करनी है तो उसे तेज स्पीड चाहिए होगी जबकि दूसरी ओर जल बोर्ड को सिर्फ वाटर मीटर की रीडिंग के लिए 5जी की जरूरत है, तो उन्हें कम स्पीड चाहिए। दोनों के लिए स्पीड अलग होगी और उसके लिए कीमत भी अलग अलग होगी।

बीते कुछ सालों में साइबर क्राइम के मामले बढ़ें हैं, क्या सरकार इस पर काबू पान के लिए कोई तैयारी कर रही है?
देखिए, 5जी एक इंटीग्रेटेड सिक्योरिटी सिस्टम के साथ आएगा। इससे पहले 4जी पर कुछ सिक्योरिटी समस्या थी। जब 5जी लॉन्च होगा, इसके कुछ सिक्योरिटी फीचर पहले से ही नेटवर्क में मौजूद होंगे। इसके अतिरिक्त चुनाव के बाद डेटा प्रोटेक्शन लॉ सरकार की तरफ से लाया जा सकता है। जिसमें गूगल, व्हाट्सएप जैसी कंपनियों को ग्राहकों को बताना होगा कि उनका डेटा कहां और कितना इस्तेमाल होगा। लेकिन हम इसकी 100 फीसदी की गारंटी नहीं दे सकते हैं। क्योंकि सबसे खास बात ग्राहकों को जागरुक होना है। उपभोक्ता कंपनियों को अपने सभी डेटा की एक्सेस दे देते हैं। इसलिए उपभोक्ताओं का जागरुक होना जरूरी है।

बीएसएनएल को लेकर कई तरह की बातें हो रही हैं, असल दिक्कत क्या है?
बीएसएनएल के साथ दो समस्याएं है। पहली समस्या ये है कि सभी दूरसंचार विभाग के पुराने कर्मचारी बीएसएनएल में आ गए हैं। बीएसएनएल का राजस्व इसे सपोर्ट नहीं कर सकता है। इसलिए सरकार वीआरएस पर विचार कर रही है। दूसरी समस्या ये है कि बीएसएएल ने खुद को प्राइवेट ऑपरेटर्स के हिसाब से तैयार नहीं किया। कंपनी ने अपने नेटवर्क को अपग्रेड नहीं किया। इसका कारण सरकारी प्रक्रिया है। सरकार को इसे ठीक करना चाहिए। बीएसएनएल के साथ शुरुआत से ऐसा नहीं था। पहले लोग कंपनी पर भरोसा करते थे। लोग बीएसएनएल की सर्विस पसंद करते थे। कीमत और क्वॉलिटी दोनों ही बिंदुओं पर बीएसएनएल प्राइवेट कंपनियों का मुकाबला नहीं कर पाई।

लेकिन कॉल ड्रॉप का क्या, अधिकांश ग्राहकों को इसकी शिकायत रहती है?
आपने जरूरी मुद्दा उठाया है। ट्राई ने भारत में कॉल ड्रॉप की समस्या से निपटने के लिए काफी कड़े कदम उठाए हैं। अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया में ऐसा नहीं है। उन्हें इतने कड़े नियमों से नहीं गुजरना पड़ता है। लेकिन चौंकाने वाली बात है कि लगभग सभी कंपनियां अपने पैमाने को प्राप्त भी कर रही हैं। दरअसल, समस्या टॉवर की है। विभिन्न क्षेत्रों में अलग अलग नियम है। मान लीजिए आप दिल्ली के किसी ऐसे क्षेत्र में रहते हैं जहां टॉवर लगाने की मंजूरी नहीं मिलती, वहां आपको कॉल ड्रॉप की समस्या होगी। वहीं आप दूसरे एरिया में जाएंगे वहां आपको इसकी शिकायत नहीं होगी, क्योंकि वहां टॉवर लगाने की मंजूरी दी गई है। ग्राहकों की शिकायत सही है, लेकिन जब आप एवरेज देखेंगे, तो कंपनियां अपने टारगेट पूरी कर रही हैं।

फिर वे लोग कौन हैं, जो कॉल ड्रॉप की शिकायत कर रहे हैं? 
देखिए कॉल ड्रॉप की समस्या इस बात पर निर्भर करती है कि आप किस एरिया में रहते हैं। आप हमें सेल टॉवर लगाने की अनुमति दें, हम आपकी समस्या दूर कर देंगे। हम किसी रेजिडेंसियल एरिया में टॉवर लगाने जाते हैं तो सोसाइटी हमें मंजूरी नहीं देती। लोग कहते हैं इससे कैंसर होता है, जबकि ऐसा नहीं है। लेकिन फिर भी कुछ लोग ऐसे हैं जो समस्या खड़ी करते हैं। इसके बाद आपको अच्छी क्वॉलिटी कैसे मिल सकती है। अगर आप हमें टॉवर नहीं लगाने देंगे, तो हम आपको ये सभी सुविधाएं कैसे दे पाएंगे।

क्या यही समस्या इंटरनेट स्पीड के साथ भी है?
यहां हमें एक बात समझनी होगी अगर किसी राउटर से सिर्फ आप जुड़े हुए हैं, तो आपको अच्छी स्पीड मिलेगी। जब यूजर्स की संख्या बढ़ेगी तो स्पीड कम होना लाजमी है। वॉइस कॉलिंग में नेटवर्क दूसरे तरह से काम करता है, जबकि डेटा यूज में नेटवर्क के काम का तरीका बदल जाता है। यूजर्स की संख्या बढ़ने के साथ नेटवर्क का एरिया भी कम हो जाता है। दूसरी बात ये है कि जब आप सिर्फ वॉइस का इस्तेमाल करते थे तो आप कितनी देर फोन पर बात करते रहे होंगे। लेकिन डेटा इस्तेमाल में कोई सीमा नहीं है। कोई यूजर अचानक से एचडी वीडियो स्ट्रीमिंग करने लगेगा, तो इसका प्रभाव पड़ना लाजमी है।

हाल में ही कुछ कंपनियों ने मिनिमम रिचार्ज का बोझ ग्राहकों पर बढ़ा दिया है, जबकि उन्होंने अपनी सर्विस की शुरुआत में लाइफ टाइम इनकमिंग का ऑफर देकर ग्राहक जोड़े थे?
मुझे ऐसा लगता है कि जब कोई कंपनी कोई प्रोडक्ट बेचती है तो सामान्यतः कुछ ऐसे नियम होते हैं, जिनके तहत कंपनियां कुछ बड़ा होने पर इन कंडीशन में बदलाव कर सकती है। अगर आप इन नियमों को ध्यान से पढ़ेंगे तो आपको ये चीजें मिलेंगी। इन कंपनियों ने भी ऐसा ही किया है। कंपनियों ने सिम कार्ड के साथ जो लाइफटाइम का वादा किया था वह सिर्फ वॉइस के लिए था। लेकिन अगर आप अब डेटा इस्तेमाल करना चाहते हैं तो आपको इसके लिए रिचार्ज कराना होगा।


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