रालोद के जयंत चौधरी के आगे बीजेपी के सत्यपाल सिंह की राह आसान नहीं, जाने किस वजह से जयंत चौधरी का पलड़ा भारी

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रालोद के जयंत चौधरी के आगे बीजेपी के सत्यपाल सिंह की राह आसान नहीं, जाने किस वजह से जयंत चौधरी का पलड़ा भारी.

बागपत में बीजेपी की राह आसान नहीं

-चुनाव से पहले बीजेपी में अंदुरूनी कलह

-गठबंधन में जयंत को हो सकता है बड़ा फायदा

बागपत। सपा-बसपा गठबंधन में रालोद के शामिल होने पर कहीं न कहीं अंदरूनी मुहर लग चुकी है। जिसमें बागपत से जयंत चौधरी के बागपत से चुनाव लड़ना तय माना जा रहा है। जहां बागपत से रालोद की ओर से जयंत चौधरी मैदान में उतरेंगे तो बीजेपी की ओर से मौजूदा केंद्रीय मंत्री सत्यपाल सिंह का चुनाव लड़ना तय माना जा रहा है। लेकिन अगर वोट समीकरण पर गौर करें तो बीजेपी के लिए राह आसान नहीं होगी। क्योंकि एक तो सपा-बसपा के साथ रालोद का गठबंधन होने के बाद वोट का प्रतिशत और बधेगा। जबकि बीजेपी के सामने कांग्रेस के उम्मीदवार से भी चुनौती मिलेगी। लेकिन इन सब में गठबंधन का पलड़ा भारी है।

अंदरुनी कलह है मुख्य वजह-

विकास ने नाम पर खुद को साबित करने का दावा करने वाले बीजेपी सांसद और केंद्रीय मंत्री सत्यपाल सिंह के सामने पांच लाख से अधिक वोट लेकर खड़े रालोद के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष जयंत चौधरी को टक्कर देना आसान नजर नहीं आ रहा है। यदि वोटरों की बराबरी मान भी ली जाये तो अपने ही जयचंद जो बागपत में बीजेपी की नींव खोद रहे हैं और सत्यपाल सिंह का अंदरूनी विरोध कर रहे हैं। उनसे निपटना आसान नहीं होगा और यह अंदरूनी विरोध बागपत में बीजेपी की सीट को गडढे में लेकर जाने की आशंका प्रबल है।

डिप्टी सीएम के कार्यक्रम से गायब रहे विधायक-

बागपत सांसद व केंद्रीय मंत्री सत्यपाल सिंह ने पांच साल में एक जन प्रतिनिधि के रूप में लोगों के दिल तो जीत लिए लेकिन एक नेता बनकर यहां के नेताओं को अपना नहीं बना सके। दूसरी पार्टीयों को छोड़कर बीजेपी में शामिल हुए कुछ ऐसे नेता जो सत्ता सुख के लिए किसी भी राजनीतिक हद तक जाने को तैयार है उन्होंने सत्यपाल सिंह का हमेंशा विरोध किया है। यही कारण है कि हाल ही में बागपत के बालैनी में हुए एक कार्यक्रम में उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य और केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी के पहुंचने के बाद यहां से तीनों विधायक नदारद दिखाई दिए। चर्चा आम है कि बागपत के तीनों विधायक सत्यपाल सिंह का विरोध कर रहे हैं और आने वाले लोकसभा में अगर भाजपा को नुकसान होगा तो ये विधायक और उनके सहयोगी इसके जिम्मेदार होंगे, बागपत में बीजेपी की अंदरूनी कलह लोक सभा चुनाव में खुलकर सामने आ सकती है। जिससे बागपत की सीट का जाना तय है।

बीजेपी की अंदरूनी कलह से रालोद को फायदा-

एक तरफ रालोद गठबंधन के रथ पर सवार है और दूसरी और बीजेपी में एक दुसरे के विरोध में खड़े यहां के नेता रालोद को फायदा पहुंचाने का काम करेगें। हालाकि रालोद अपनी जीत निश्चित मानकर चल रही है।

ये समीकरण भी जीत की असली वजह-

बागपत के 2014 के लोकसभा चुनाव में सत्यपाल सिंह को 4 लाख 23 हजार , सपा से गुलाम मोहम्मद को 2 लाख 13 हजार,चौधरी अजित सिंह को 1 लाख 99 हजार, और बसपा से प्रशांत चैधरी को 1 लाख 41 हजार वोट मिले थे। अब गठबंधन की बात की जाये तो तीनों मिलकर 5 लाख 56 हजार का आंकडा पार कर रही है। यह वोट तब मिले थे जब मोदी लहर थी चुकिं पार्टीया अब मोदी लहर नहीं मान रही है तो भाजपा को 4 लाख वोट मिल पाना सपने देखने जैसा है। इसलिए रालोद तीनों पार्टीयों के गठबंधन से अपनी जीत का चशमा लेकर चुनाव मैदान में कुद चुकी है।

 

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